तेजाब का हमला हत्या से बड़ा अपराध

सुन्दरता बनाम अभिशाप
जब कोई शिशु जन्म लेता है तो यदि कुरुप है तो माता पिता द्वारा अक्सर यह कहा जाता है कि ईश्वर ने रुप ही नही दिया तो इसमें किसी का क्या दोष? यदि कन्या हो तो सबसे पहले यह बात मन में आती है कि बड़े होकर इसकी शादी कैसे होगी! यदि बालक सुन्दर है तो लोगों द्वारा प्रेम व्यक्त करने के अपने अलग अन्दाज होते हैं। अब बड़े होकर यदि यही सुन्दरता अभिशाप बन जाए, किसी की आंखों में खटकने लगे और हर कीमत पर उसे हासिल करने की कोशिशों में उसे कुरुप तक बना दिया जाए तो इससे बड़ा जुर्म क्या हो सकता है?

acid
सुन्दर होना कोई अपराध नहीं है लेकिन जब सौन्दर्य जीवन भर के लिए दूसरों पर आश्रित रहने को मजबूर हो जाए और जिन्दगी की सांसे पूरी करना दूभर हो जाए, यह उन पीड़ितों से ज्यादा कौन जान सकता है जिनके लिए उनका सुन्दर होना किसी के प्रतिशोध का कारण बन गया, लोलुप निगाहों और कुत्सित वासनाओं का विरोध करने और कामुक चेष्टाओं को नकार देने या सम्बंध बनाने या शादी से इंकार कर देने का परिणाम तेजाबी हमले से पूरे शरीर को विकृत कर देना हो तो क्या कहा जाए? यह तिल-तिल कर मौत का इंतजार करने के लिए छोड़ देने का हिंसात्मक, पाशविक और अमानवीय व्यव्यहार है।
पिछले दिनों राजधानी में छांव नामक संस्था द्वारा तेजाब का हमला झेल चुकी महिलाओं के लिए एक वर्कशॉप का आयोजन हुआ, जिसमें इन युवतियों को जो कभी सुन्दरता का प्रतीक थीं, जीवन भर के अपने दुःख को सहने के लिए समर्थ बनाने का एक प्रशंसनीय प्रयास है। इस संस्था ने उन्हें आत्म निर्भर बनाने के लिए शीरोज (शी अर्थात महिला और हीरोज़ की जगह शीरोज़) कैफे खोलने की शुरुआत की है जो वर्तमान में आगरा, जयपुर और लखनऊ में है। इन्हें यही महिलाएं चलाती हैं और अपनी जिन्दगी के ताने बाने को जोड़ने की जददो जहद में लगी रहती हैं।
हमारे देश में हीरो तो बहुत हैं लेकिन शीरोज का जिन्दगी की जंग लड़ने का यह अनूठा प्रयास है। ऐसी कुछ साहसी महिलाओं से बातचीत करना मिलना और किस तरह से उन्होंने अपने जीवन के इस दुखद अध्याय को पलट कर एक सामान्य जीवन जीने में सफलता प्राप्त की, यह सम्मान का प्रतीक है।
शीरोज हैंगआउट केवल रेस्टोरेंट या कैफे न होकर इन स्थानों पर आने वाले लोगों के लिए प्रेरणास्रोत भी है। इस कैफे में आर्ट गैलरी, बुक रीडिंग सेक्शन के अलावा वर्कशॉप और प्रदर्शनी के लिए जगह भी है जहां इन के हाथों का हुनर और कौशल दिखता है। यहां आने वाले लोग इन प्रदर्शनियों में लगी कलाकृतियां देखते और किताबें पढ़ते हुए अपना समय बिता सकते हैं। पहले यह कोशिश आगरा में की गई जहां देश-विदेश से आने वाले हजारों पर्यटकों से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली। इसके अलावा संस्था द्वारा नुक्कड़ नाटक, कैंपेन, फैशन शो के जरिए शहर-शहर जाकर लोगों को जागरुक भी किया जाता है।
तराना नाम ही संगीत से जुड़ा है तो अनुमान लगाइए वह कितनी सुन्दर रही होगी। आज जब उसका चेहरा, गर्दन, कंधे और बाजू केवल इस कारण बर्बाद कर दिए गए कि जो लड़का उसे अपना जीवन साथी बनाना चाहता था उसने और उसकी मां ने दहेज न मिलने की नाउम्मीदी में यह दुष्कृत्य किया। आज वह अपनी जिन्दगी इस संस्था छांव के साए में जी रही है। इसी तरह अन्य साहसी युवतियों में रेशमा, पूजा, लक्ष्मी, साधना, रितु, शाइना,तूबा, भावना, हसीना, सुनीता, चंचल, सोनम, शबनम तथा अन्य शामिल हैं।
छांव फाउंडेशन की कर्ताधर्ता स्वयं एसिड अटैक पीड़ित लक्ष्मी है। अपने उड़ान प्रोजेक्ट के जरिए ट्रेनिंग कैंप में पीड़िताओं को योग, नृत्य, अंग्रेजी बोलना, संगीत, कला और रॉक क्लाइंबिंग समेत कई गतिविधियां कराईं जाती हैं। जब ये महिलाएं डिजाइनर कपड़ों में रैंप पर थिरकतीं हैं तो उनका हौसला देखकर दंग रह जाना स्वभाविक है।
जिस समाज में महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जाता है, उनका उस सदमे से उबरकर नए सिरे से जिंदगी शुरू करना हिम्मत का काम है।
कानून की कमजोरी
दुर्भाग्य यही है कि तेजाब फेंकने वाले ज्यादातर व्यक्ति कानून की आंखों में धूल झोकने में कामयाब हुए हैं और कानूनन प्रतिबंध लगने के बाद भी तेजाब की बिक्री जारी है। अभी तक केवल एक व्यक्ति को एसिड अटैक के मामले में मृत्यु दण्ड दिया गया है और ज्यादातर मामलों में कुछ साल की सजा के बाद उन्हें आजाद छोड़ दिया गया है। होना यह चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों को मृत्यु दण्ड या न्यूनतम आजीवन कारावास की सजा मिलनी चाहिए। उन्हें जमानत पर छोड़ने का प्रावधान तो होना ही नहीं चाहिए। यह किसी की हत्या कर देने से भी अधिक जघन्य अपराध है तो ऐसे में यदि वर्तमान कानून की समीक्षा कर उसमें बदलाव करना पड़े तो भी हमारी न्याय व्यव्स्था को संकोच नहीं करना चाहिए।
आम तौर से देखा गया है कि अस्पताल भी अपने यहां समुचित सुविधाएं न होने के कारण दाखिल करने से इंकार कर देते हैं। यह कानूनन अनिवार्य कर देना चाहिए कि जलने के उपचार की व्यवस्था की तरह एसिड हमले के उपचार की व्यवस्था सभी चिकित्सालयों और अस्पतालों में हो। इसी प्रकार नौकरियों में जैसे आज दिव्यांगों के लिए व्यवस्था की गई है उसी प्रकार इन साहसी महिलाओं के लिए नौकरी और उचित रोजगार का इंतजाम होना चाहिए।
हमारे देश में सन् 2012ए 2013, 2014 और 2015 में ऐसे मामलों की संख्या क्रमशः 106, 122, 349 और 500 है। हालांकि इन संख्याओं पर ज्यादा भरोसा नही किया जा सकता क्योंकि हर एसिड अटैक की रिपोर्ट पीड़ित परिवार द्वारा की गई हो यह जरुरी नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में 10 हजार से ज्यादा तेजाबी हमले की घटनाएं सामने आई हैं। भारत में 35 प्रतिशत विवाह से इंकार करने, दहेज न लाने, पति से अनबन होने या ससुराल में अत्याचार का विरोध करने के कारण होती है। लगभग 20 प्रतिशत मामले जमीन जायजाद से जुड़े होते हैं। पुरुषों पर भी तेजाब फेकने की घटनाएं सामने आई हैं। एतिहासिक तथ्य के अनुसार सबसे पहले एक पुरुष पर ही तेजाब फेंका गया था। उद्देश्य केवल एक ही होता है कि यदि आप किसी से जबरदस्ती अपनी बात नहीं मनवा सकते तो उसे उस दशा में पहुंचा दें कि वह शारीरिक रुप से अक्षम हो जाए, सामाजिक रुप से उसका बहिष्कार हो जाए और आर्थिक रुप से कंगाल कर दिया जाए।
जीवन भर की लड़ाई
एसिड हमले से पीड़ित व्यक्ति को जीवन भर हर क्षेत्र में अपने हक के लिए लड़ना पड़ता है। परिवार और समाज उन्हें बोझ समझता है। जब किसी का चेहरा बिगड़ जाए तो अंदाजा लगाना भी मुश्किल है कि उनपर क्या गुजरती है। परिवार, दोस्त, समाज हर कोई उनसे मुंह मोड़ लेता है। इन हालातो में अधिकतर महिलाएं अपना आत्मविश्वास खो बैठती हैं, अपने आपको अकेला कर लेती हैं और किसी से बात करने से भी कतराती हैं।
हमले का असर
तेजाब के हमलों के कुप्रभाव बहुत गंभीर हैं। पीड़ित की त्वचा के साथ-साथ तेजाब उसकी हड्डियों को भी प्रभावित करता है जो वक्त से पहले कमजोर हो जाती हैं। अगर तेजाब आंखों पर पड़े तो आंखों की रोशनी चली जाती है। कई बार सर्जरी कराने के बाद भी बहुत कम फायदा हो पाता है। इसके उलट बार-बार सर्जरी के कारण प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि तेजाब से जले का इलाज बहुत महंगा होता है। अलबत्ता इसकी कोई गारंटी नहीं होती है कि सर्जरी कराने के बाद भी पीड़ित का बिगड़ा हुआ चेहरा या बदन पूरी तरह ठीक हो जाएगा।
जहां तक प्राथमिक सहायता का संबंध है एसिड हमले के तुरंत बाद प्रभावित अंग पर कम से कम आधा घंटा या तब तक पानी डालते रहें जब तक जलन कम न हो जाए। ध्यान रहे कि एसिड की धुलाई करते समय यह पानी शरीर के शेष हिस्सों पर न बहने पाए।
न्यायमूर्ति आरएम लोढा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने स्टाप एसिड अटैक्स की निदेशक लक्ष्मी की जनहित याचिका पर न केवल तेजाब बिक्री को नियंत्रित करने के लिये आदेश जारी किये बल्कि कार्यवाही न करने पर राज्यों को कड़ी फटकार भी लगाई थी। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया था कि तेजाब हमले के बारे में प्राथमिकी दर्ज होते ही संबंधित एसडीएम जांच करे।
तेजाब पीड़ित महिला को 3 लाख मुआवजा और मुफ्त इलाज का प्रावधान है जबकि इसका खर्च 50 से 75 लाख तक होता है। आज कितनी ही पीड़ित महिलाएं इलाज के इंतजार में हैं। कुछ ही अस्पताल ऐसे हैं जो इन पीड़ित महिलाओं का इलाज करते हैं जैसे अपोलो, मैक्स और सफदरजंग अस्पताल । साथ ही सरकार की तरफ से न तो इनकी शिक्षा और न ही इनके रहने और नौकरी का कोई प्रावधान है।
जिस तरह दुकान खोलने के लिए रजिस्ट्रेशन की ज़रूरत होती है उसी तरह एसिड बेचने के लिए भी विष अधिनियम 1919 के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन ज़रूरी किया गया है। लेकिन हमारे देश में कानून का पालन न करने वालो को साहस का प्रतीक मान लिया जाता है। जिन पर उसका पालन करवाने की जिम्मेदारी होती है, वे ही अक्सर अपराधी को बचाने का काम करते हैं। उदाहरण के लिए तेजाब बिक्री की रिपोर्ट विक्रेता को तीन दिनों के अंदर स्थानीय पुलिस को देना अनिवार्य है। इसके अलावा 18 साल से कम उम्र के लोगों के हाथों इसे नहीं बेचा जा सकता। जो व्यक्ति एसिड ख़रीद रहा है उसके पास पहचान पत्र होना चाहिए और यह भी बताना जरुरी है कि वह एसिड क्यों ख़रीद रहा है। लेकिन सच यही है कि इन मापदंडों के बारे में न तो बेचने वालों को और न ही खरीदने वालों को ही जानकारी है। ऐसे में अपराध पर काबू पाना केवल कल्पना ही है।
email : pooranchandsarin@gmail.com
(भारत)

Posted in BIN

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *