वायु प्रदूषण की हकीकत क्या है?

न काहू से दोस्ती न काहू से बैर
लेखक: पूरन चंद सरीन

वायु प्रदूषण की हकीकत क्या है?
इन दिनों अखबारों से लेकर घर, दुकान, दफ्तर, फैक्टरी में इस बात को लेकर काफी बहस हो रही है कि सरकार की तरफ से नियुक्त नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल के आदेश के मुताबिक दस साल की उम्र से ज्यादा की डीजल से चलने वाली गाड़ियां बंद कर दी जाएं।


इसका सबसे बड़ा निशाना दिल्ली और आसपास के इलाके हैं क्योंकि यह शहर पहले ही दुनिया के सबसे खराब शहरों में पहले नम्बर पर हैं जहां वायु प्रदूषण यानि जहरीली हवा सबसे ज्यादा है।
दिल्ली में लगभग 1 लाख 60 हजार गाड़ियां हैं जो दस साल से ज्यादा पुरानी हैं। नोयडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव तथा आसपास के क्षेत्रों में इनकी संख्या कितनी है, कोई नहीं जानता। इनमें निजी से लेकर कमर्शियल गाड़ियां और ट्रक शामिल हैं।
दिल्ली में इनकी धरपकड़ भी शुरू होने की खबर मिल रही है जो कुछ और नहीं कानून के नाम पर अवैध उगाही और उसके बाद खुला छोड़ देने का एक आजमाया हुआ तरीका है। यह बात भी सोचने की है क्या हमारे पास इन गाड़ियों को पकड़ने और फिर उन्हें रखने तथा उनसे पैदा हुए जाम से निबटने का भी कोई तरीका है। कतई नहीं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी जब अपने भाषणों में यह कहते हैं कि अब एअरकंडीशन कमरों से योजनाएं नहीं निकला करेंगी तो उनकी बात पर यकीन करने का मन होता है। वह ईमानदारी से इसे लागू करना चाहते हैं लेकिन जिन्हें एअरकंडीशन में बैठने की आदत पड़ चुकी है, जिनकी सोच को जंग लग चुकी है, उस नौकरशाही का क्या किया जाए?

अपना कूड़ा पड़ोसी के द्वार
यहां कुछ हकीकतों के बारे में समझना जरूरी हैः
1) इस आदेश के लागू होने पर दिल्ली वाले अपनी दस साल से ज्यादा पुरानी गाडियों को किसी भी दाम पर दूसरे प्रदेशों में बेचने की कोशिश करेगें। क्या इसका यह मतलब नहीं है कि इन गाड़ियों को दूसरी जगह पर चलाने दिया जाए और वहां की भी हवा को जहरीली बना दिया जाए ताकि वे शहर भी दिल्ली जैसी हालत में आ जाएं?
2) दिल्ली में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश से लेकर अन्य प्रदेशों से प्रतिदिन सब्जी, फल, अनाज की ढुलाई होती है और लाखों लोग बसों और गाड़ियों से आते जाते हैं। क्या इस आदेश से यह सब ठहर नहीं जाएगा? जी हां, जमाखोरों की बन आएगी और वे मनमाने दामों पर जरूरी चीजों की दुकानदारी करेगें और महंगाई आसमान छूने लगेगी। वैसे भी बेमौसम बरसात ने पहले ही कहर ढाया हुआ है।
3) क्या यह आदेश कुछ चालाक और स्वार्थी लोगों द्वारा ट्रिब्युनल के सामने दी गयी भ्रामक दलीलों का परिणाम नहीं है? कानून तो कहते हैं कि अंधा होता है और दलील और दलाली के जरिए उसके अंधेपन का फायदा उठाकर अव्यवहारिक आदेश जारी नहीं करवा लिए जाते?
अब हम एक और हकीकत से पर्दा उठाते हैं।
पिछले दिनों नई गाड़ियों की बिक्री में काफी गिरावट आई थी और ये सब गाड़ियां भारतीय और विदेशी कम्पनियों के धन्नासेठ मालिकों की हैं।
इस आदेश से लोग पुरानी गाड़ियों को औने पौने दाम पर बेचकर नयी गाड़ियां खरीदने को मजबूर हो जाएगें। इनमें कार, जीप, ट्रक, बस सभी आते हैं।
एक और हकीकत
कोई व्यक्ति जब गाड़ी खरीदता है तो 8-10 साल तो उसकी किस्तों के चुकाने में ही लग जाते हैं और जब वह सोचता है कि अब जरा गाड़ी का सुख अच्छी तरह लिया जाए तो कानून के मुताबिक उसे अपनी गाड़ी बेचकर नयी गाड़ी फिर से किस्तों में खरीदनी पडेगी। मतलब कि बैंक रूपी साहूकार और मोटर कम्पनी रूपी मुनाफाखोरों का फायदा होगा और उनके चंगुल से निकलना आसान नहीं।
अब हम बताते हैं कि आदेश में कहां खामियां हैं जिनकी ओर दबी जुबान से ट्रिब्युनल के कुछ सदस्यों ने इशारा भी किया है।
हमारे यहां प्रदूषण नियंत्रित करने के जो उपाय हैं वह ज्यादातर विकसित और विकासशील देशों में लागू नियमों से 10-15 साल पुराने हैं।
दूसरी बात यह है कि गाड़ियों में प्रदूषण नियन्त्रित करने के जो उपकरण लगते हें वह बहुत मंहगे हैं और उन्हें लगवाना हरेक के बस की बात नहीं।
जो होना चाहिए
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की जनधन योजना और हाल ही में शुरू की गयी मुद्रा योजना इसमें बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकती है।
गाड़ी से प्रदूषण तब होता है जब उसका इंजन पुराना हो जाए और धुंआ देने लगे और यह जरूरी हो जाता है कि या तो इसकी ओवरहालिंग हो या इसे बदल दिया जाए।
ध्यान रहे गाड़ी में इंजन के अलावा और भी बहुत कुछ होता है जो लम्बे वक्त तक बढ़िया हालत में रहता है और उसका रख रखाव भी कोई ज्यादा मंहगा नहीं होता।

मतलब यह कि इंजन की मरम्मत या नया इंजन लगने से पूरी गाड़ी फिर से ठीक उसी तरह चलने को तैयार हो सकती है जैसे कि किसी व्यक्ति के दिल की बीमारी उसका आपरेशन करने से लेकर दिल बदल देने तक से व्यक्ति को नयी जिंदगी मिल जाती है।
अब जब इंजन ही बदलना है तो उसके लिए पूरी गाड़ी का बलिदान क्यों दिया जाए?

टेक्नालाजी हमारे पास भी है
कुछ वर्ष पहले देहरादून स्थित इंण्डियन इंस्टीट्यूट आफ पेट्रोलियम द्वारा तैयार की गयी टेक्नालाजी पर फिल्में बनाने का अवसर मिला। इस इंस्टीट्यूट ने गाड़ियों से निकलने वाले प्रदूषण को नियन्त्रित करने से लेकर बड़ी आयल रिफाईनरियों तक से होने वाले प्रदूषण को काबू में रखने की टेक्नालाजी विकसित की है। गाड़ियों में कनवर्टर लगता है उसकी लागत बहुत कम आती है जबकि गाड़ी बनाने वाली कम्पनियां उसके दाम कई गुणा वसूलते हैं।

हमारे यहां उस तरह की टेक्नालाजी है जो धुंआ उगलती गाड़ियों, जहर उगलती चिमनियों और मौसम की वजह से पैदा हुए अंन्धड़ों तक से हमें बचा सकती हैं। मतलब यह कि किसी दूसरे देश के आसरे हमें नहीं रहना है कि वह टेक्नालाजी दे तब हम प्रदूषण की रोकथाम करें।
व्यवहारिक सुझाव
एक और दृश्य की कल्पना कीजिए जो हकीकत बन सकता है। जनधन और मुद्रा जैसी योजनाओं से देश में हजारों की तादाद में ऐसे छोटे छोटे कल कारखाने खोले जा सकते हैं जहां इंजन में लगने वाले छोटे बड़े पुर्जे बने और जो ब्यूरो आफ इण्डियन स्टैण्डर्ड द्वारा तय मानकों पर आधारित हों।
एक ही आटोमोटिव क्षेत्र में हजारों कल कारखानों के खुल जाने से लाखों लोगों को रोजी रोटी मिलेगी और करोड़ों लोगों का जीवन जहरीली हवा में सांस लेने से बच जाएगा।

एक बात और, गाडियां बनाने वाली कम्पनियां भी नया इंजन देती हैं लेकिन वह एक तो बहुत महंगा होता है और दूसरे उन्हीं से लेने की मजबूरी और वह ब्राण्ड के नाम पर ग्राहको का शोषण करने का एक भी मौका नहीं छोड़ते।
अब हम बात करते हैं वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कुछ और बातों की।

झाडू से आगे बढ़ें
पंड़ित नेहरू ने सफाई कर्मचारी की कमर न झुकने देने के लिए बड़े डंडे वाली झाडू पकड़ाई जो मोदी जी ने भी इन कर्मचारियों को वैसी की वैसी थमाई। केजरीवाल ने तो झाडू की बदौलत दिल्ली की सत्ता भी हासिल कर ली।
इन लोगों को झाडू की सियासत में उलझा रहने दीजिए और यह सोचिए कि क्या सफाई करने के लिए झाडू का कोई विकल्प है?
विकल्प है और वह है वैक्यूम क्लीनर और दूसरे यंत्र जो आज सभी देशों में धडल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं। इनसे न धूल उड़ती हे और न कूड़ा जलाने की मजबूरी है।
जरा सोचिए, यदि सफाई करने की छोटी छोटी मशीने बनाने के कारखाने खुल जाए तो कितने लोगों को रोजगार मिलेगा और हम जहरीली हवा में सांस लेने और धूल फांकने से बच जाएगें।
हवा में जहर एक और वजह से भी धुलता है और वह यह कि जब हम अपना घर बनाते हैं या कोई उद्योगपति इंडस्ट्री लगाता है या कोई कोलेानाईजर बस्ती का निर्माण करता है तो इतनी धूल मिट्टी उड़ती है कि उसमें सांस लेने से हमारे फेफड़े जबाब देने लगते हैं।
क्या इन नियमों पर सख्ती से अमल नहीं हो सकता कि कोई भी निर्माण करने से पहले ऐसे उपाय करना सुनिश्चित कर लिया जाए कि धूल मिट्टी का एक भी कण पड़ौसी या वहां से गुजरने वालों को न झेलना पडे़। यह हो सकता है। तो फिर सरकार की तो छोड़िये, हम आप जब अपना घर बनाएं, फैक्टरी बनाएं तो इतना सुनिश्चित कर ही लें तो बहुत सुविधा हो सकती है।
काम करने वाले राज मिस्त्री को दस्ताने, जूते और और मास्क दे दी दीजिए तो वह आपको दुआ देगा।
इसी तरह उन सभी चीजों से निंजात पाई जा सकती है जो हमारी सांस के साथ हमारे शरीर में जहर भरने के लिए जानी जाती है।
इनमें धुआं उगलने वाले चूल्हों से लेकर मिलावटी पेट्रोल, डीजल तक आते हैं। एलपीजी और सीएनजी के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल से प्रदूषण से बचा जा सकता है और फिर वही बात कि ये प्रदूषण मुक्त इंधन तैयार करने के कारखानों के खुलने से कितने लोगों को रोजगार मिल सकता है और आम के आम, गुठलियों के दाम की कहावत भी सिद्ध हो सकती है।
सरकार का पर्यावरण मंत्रालय इस दिशा में पहल तो करे, लोगों की जिंदगी से वायु प्रदूषण का जहर पूरी तरह सफलतापूर्वक निकाला जा सकता है।
एक बात और नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल अपने आदेश पर पुनर्विचार करें तथा देश के वैज्ञानिकों तथा नीति निर्माताओं से राय लें और तब कोई जनोपयोगी निर्णय लें तो देशवासी उनके कृतज्ञ रहेंगे।

(भारत)

 

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